इंसान का असली दुश्मन उसका नफ़्स

नफ़्स पर काबू और हक़ीक़त की पहचान:

इंसान की ज़िंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान उसका अपना नफ़्स (ख़्वाहिशें और अहंकार) है। अगर इंसान बाहरी दुश्मनों से लड़ने के बजाय अपने नफ़्स को काबू में कर ले तो उसकी आधी मुश्किलें हल हो जाती हैं। नफ़्स ही इंसान के बीच दुश्मनी और नफ़रतें पैदा करता है। जब इंसान अपने ही उस्लूब और हठधर्मी पर अड़ा रहता है तो वह अंधा और बहरा बन जाता है। अपने शिक्षक या रहबर से दुश्मनी करना दरअसल अपने आप को नुकसान पहुँचाना है।

इंसान की फ़ितरत ऐसी है कि वह अपने बराबर वाले को भी अपने से बड़ा नहीं देख सकता। इसी वजह से उसमें हसद (ईर्ष्या) पैदा होता है और हसद इंसान के रिज़्क़ को कम कर देता है। अल्लाह ने इंसान की राह दिखाने के लिए नबियों (अलैहिस्सलाम) को भेजा, ताकि वह उसे उसकी असल पहचान और मक़सद से आगाह करें।

अशरफ़ुल मख़लूक़ात

दुनिया में नबी और औलिया इंसान को सही राह दिखाते हैं। उनका मक़ाम इतना बुलंद होता है कि वह दूसरों को अपने नूर से फ़ैज़ान (बरकत) पहुँचाते हैं। अल्लाह अज़्ज़वजल अपनी रहमत और क़ुदरत से इंसान की बुराइयों को नेकियों में बदल देता है। इसी मिट्टी और पानी से इंसान को “अशरफ़ुल मख़लूक़ात” (सारी मख़लूक़ात से बेहतर) बनाया।

अल्लाह की तरफ़ से यह नेमत है कि उसने इंसान को “वहदतुल वुजूद” यानी अपनी हक़ीक़त देखने और पहचानने की क्षमता दी। असल मौजूद वही अल्लाह है। अगर इंसान वहम और गुमान में पड़ जाए तो उसका अल्लाह पर भरोसा उठ जाता है और वही असल में मुनाफ़िक़ बनता है।

मशाहिदा-ए-हक़

अगर इंसान के अंदरूनी दिल (बातिन) में नूर नहीं है, तो उसे चाहिए कि किसी सच्चे रहबर के हवाले खुद को कर दे। अकेले राह-ए-हक़ में बढ़ना ख़तरनाक हो सकता है। क्योंकि “फ़ना” (अहंकार और नफ़्स का मिट जाना) के बाद ही इंसान को “मशाहिदा-ए-हक़” यानी अल्लाह की हक़ीक़त का दीदार नसीब होता है।

हमें इस वाक़िये से क्या सीख मिलती है?

इस वाक़िये से हमें यह सीख मिलती है कि इंसान का असली दुश्मन बाहरी लोग नहीं बल्कि उसका अपना नफ़्स है। अगर हम अपने अंदर की बुराइयों, अहंकार और हसद को काबू में कर लें तो दुनिया और आख़िरत दोनों संवर सकते हैं। अल्लाह पर भरोसा रखकर और किसी सच्चे रहबर की रहनुमाई में चलकर ही इंसान हक़ीक़त तक पहुँच सकता है।

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