मुरशिद की इज़्ज़त और मर्द-ए-कामिल की शान

साहिब-ए-दिल और अधूरे इंसान का फर्क:

ये वाकिए हमें यह सिखाते हैं कि साहिब-ए-दिल इंसान, यानी वह जो अल्लाह के नूर से रौशन है और आध्यात्मिक ऊँचाइयों को पा चुका है, उसके लिए हर नुकसानदेह चीज़ भी लाभकारी बन जाती है। अगर वह ज़हर भी खा ले तो वह उसके लिए शहद का असर दिखाता है। इसका कारण यह है कि उसका दिल खामियों से पवित्र हो चुका होता है और वह दुनियावी बुराइयों से बच चुका होता है।

लेकिन जो व्यक्ति इस राह का नया साधक है, उसे धैर्य और सब्र से काम लेना चाहिए। जैसे बीमार इंसान को ठीक होने के लिए समय चाहिए, वैसे ही आध्यात्मिक राह पर चलने वाले को भी धैर्य से काम लेना होता है ताकि उसके दर्जे ऊँचे होते जाएं।

हज़रत नबी करीम  का फरमान:
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया – ऐ नादान! कभी अपने मुरशिद की बराबरी की कोशिश मत करना। अगर तू अपने शेख से लड़ाई करेगा तो नुकसान तेरा ही होगा। अगर तू नमरूद है तो आग में मत कूद, और अगर आग में जाना ही है तो पहले इबराहीम अलैहिस्सलाम की तरह बन। अगर तैराक नहीं है तो खुद को पानी में मत डाल।

यह हिदायत साफ़ बताती है कि राह-ए-तसव्वुफ़ (आध्यात्मिक सफर) में मुरशिद और मार्गदर्शक की अहमियत कितनी ज़्यादा है

मर्द-ए-कामिल की शान:
एक मर्द-ए-कामिल यानी परिपूर्ण इंसान, अधूरी और बेकार लगने वाली चीज़ से भी फायदा उठा लेता है। अगर वह मिट्टी को पकड़ ले तो वह सोना बन जाती है, और चाहे तो सोने को मिट्टी बना दे। क्योंकि वह इंसान अल्लाह की बारगाह में इतना मक़बूल होता है कि उसके हर काम में अल्लाह की मदद शामिल होती है।

इसके उलट, नाक़िस यानी अधूरा इंसान, अपने हर काम में धोखा और नुकसान ही पैदा करता है। जैसे बीमार इंसान का हर काम उसकी बीमारी को और बढ़ा देता है।

यहाँ तक कि अगर मर्द-ए-कामिल कोई ऐसी बात भी करे जो सतही तौर पर गलत लगे, तो भी वह अल्लाह की नज़र में नेक और दीन बन जाती है। इसलिए ऐसे इंसान के साथ ताल्लुक़ रखते समय बहुत होशियारी और अदब ज़रूरी है।

इस वाक़िए से हमें क्या सीख मिलती है?

इस वाक़िए से हमें यह शिक्षा मिलती है कि –

  • मुरशिद और रहबर की इज़्ज़त करना ज़रूरी है।

  • साहिब-ए-दिल इंसान अल्लाह की मदद से हर नुकसानदेह चीज़ को फायदा बना लेता है।

  • अधूरे इंसान का हर काम नुकसानदायक हो सकता है।

  • आध्यात्मिक तरक्की के लिए धैर्य, सब्र और अदब सबसे अहम हैं।

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