इंसान का असली रिश्ता और हकीकत

इंसान और शेख़-ए-कामिल का रूहानी रिश्ता:

इंसान की रूहानी यात्रा को समझाने के लिए बुज़ुर्गों ने एक बड़ी सुंदर मिसाल दी है। उन्होंने फरमाया कि इंसान एक बतख के अंडे की तरह है जिसे एक मुर्गी  ने पाला हो। उसकी असली माँ पानी से जुड़ी है, जबकि दाई का रिश्ता जमीन से है। यही वजह है कि इंसान की रुचि कभी दुनिया (ख़ुश्की) की ओर खिंचती है और कभी हक़ीक़त के समंदर (पानी) की ओर।

हमें चाहिए कि हम दुनिया की इस ख़ुश्की से निकलकर रूहानी समंदर की ओर बढ़ें। अगर दाई हमें पानी से डराए, तो घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि रूह का सफर ही इंसान का असली मकसद है।

जिस्म और रूह का रिश्ता

इंसान का जिस्म मिट्टी से बना है, जबकि उसकी रूह वहदत के समंदर से जुड़ी हुई है। इसी कारण इंसान को अल्लाह के करम से यह क्षमता मिली है कि वह दोनों दुनियाओं में कदम रख सके।

हज़रत नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम भी एक तरफ अपनी इंसानियत के कारण इस दुनिया से जुड़े हुए थे और दूसरी तरफ उनकी रूह लगातार वही से जुड़ी रहती थी। यही हाल शेख़-ए-कामिल का होता है। शेख़ कामिल समंदर की तरह हैं और हम उनके सामने केवल एक छोटी-सी जल-पक्षी (मरग़-ए-आब) की तरह।

शेख़-ए-कामिल की अहमियत

जब इंसान शेख़-ए-कामिल की रहनुमाई में समंदर में गोता लगाता है, तो उसकी सुरक्षा के लिए अल्लाह तआला लाखों साधन पैदा कर देता है। लेकिन इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह अपने अहम (ego) के कारण शेख़ का हाथ पकड़ने में शर्म महसूस करता है। यही वजह है कि उसकी नज़र से शेख़ की हकीकत छिपी रहती है।

अगर इंसान को आखिरत की भलाई और अंजाम की सफलता का यकीन हो जाए, तो वह रास्ते की मुश्किलों को बहुत आसानी से बर्दाश्त कर सकता है।

इंसान की ग़फ़लत

इंसान की ग़फ़लत उसे छोटे-छोटे मक़सद की तरफ़ लगाकर रखती है और वह असली और ऊँचे मक़सद को भुला देता है। वह केवल दुनिया के असबाब (साधन) में ही उलझा रहता है और असबाब के पैदा करने वाले (अल्लाह) की तरफ़ ध्यान नहीं देता।

लेकिन खुशक़िस्मत वह है जो असबाब से आगे बढ़कर असबाब पैदा करने वाले पर नज़र रखता है। ऐसे इंसान की नज़र में यह दुनिया और इसके सारे साधन तुच्छ (हीन) हो जाते हैं।

सीख

इस वाक़िए से हमें यह सीख मिलती है कि इंसान को अपनी असली हकीकत को पहचानना चाहिए। दुनिया केवल एक अस्थायी जगह है, जबकि असली मक़सद रूह को उसके समंदर (अल्लाह से रिश्ते) तक पहुँचाना है। शेख़-ए-कामिल की रहनुमाई को अपनाने से इंसान न सिर्फ सुरक्षित रहता है बल्कि वह अपने असली मक़सद तक आसानी से पहुँच जाता है।

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