औरत, अक़्लमंदी और हक़ की पहचान
हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
औरत अक़्लमंद और दिल वाले लोगों पर ग़ालिब रहती है। इसके उलट, जाहिल लोग औरतों पर ग़ालिब होते हैं। क्योंकि जाहिल लोग अकड़, सख़्ती और जिद्दी स्वभाव में ज़िंदगी गुज़ारते हैं। उनके दिलों में रहम और करम की सिफ़तें (गुण) कम होती हैं और उन पर हर वक़्त हैवानियत का असर रहता है।
यहां समझाया गया है कि जाहिल इंसान की मोहब्बत हमेशा अस्थायी होती है, क्योंकि उनकी मोहब्बत अक़्ल और दिल से नहीं बल्कि ग़ुस्से और शहवत (इच्छाओं) से जुड़ी होती है। ये दोनों हैवानों जैसी सिफ़तें हैं।
औरत और हक़ का नूर
लेख में यह भी बताया गया है कि असली माशूक़ (प्रेम) जब नज़र आता है तो वह हक़ का परतौ (अक्स/झलक) होता है। यानी उसमें अल्लाह का नूर दिखाई देता है, न कि मख़लूक़ (इंसान) का नूर।
अक़्लमंद लोग इस बात को समझते हैं कि हर चलने वाली चीज़ को चलाने वाला कोई होता है, और वह सिर्फ़ अल्लाह है।
अल्लाह की रहमत और उसकी मोहब्बत
अल्लाह तआला बहुत ग़फ़ूर-उर-रहीम (माफ़ करने वाला और रहम करने वाला) है। पूरी कायनात उस पर आशिक़ है। यहां तक कि अदम (शून्य), जूद (बख़्शिश/दान) और ईमान भी अल्लाह के आशिक़ हैं।
इसका मतलब यह है कि अल्लाह की मोहब्बत और उसकी रहमत हर जगह फैली हुई है। जो इंसान दिल और अक़्ल से काम लेता है, वह इस नूर को पहचान लेता है।
सीख
इस वाक़िए से हमें यह सीख मिलती है कि औरत का असली असर अक़्लमंद और दिल वाले लोगों पर होता है। जाहिल लोग सिर्फ़ शहवत और ग़ुस्से में रहते हैं। हमें चाहिए कि मोहब्बत को हैवानियत से अलग करें और अल्लाह के नूर को पहचानकर उस पर ईमान लाएँ।



