औलिया की नसीहत और बहार की सीख

बहार, अक़्ल और औलिया की नसीहत

हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का एक अनमोल फ़रमान है – मौसम-ए-बहार  की ठंडक से अपने जिस्म को मत ढको। यह ठंडक अल्लाह को तलाश करने वाले आशिक़ों के लिए नेमत (बरकत) है। नंगे जिस्म बाग़ों में जाओ और ख़िज़ां (पतझड़) से बचो।

आम लोगों ने इस हदीस का सिर्फ़ ज़ाहिरी (बाहरी) मतलब लिया और असल हक़ीक़त को न समझ पाए। असल मायने यह हैं कि ख़िज़ां से मुराद इंसान का नफ़्स और ख़्वाहिशें हैं, जबकि बहार इंसान की अक़्ल और रूह है।

अक़्ल और रूह की असलियत

लेख में बताया गया है कि अगर तुम्हारी अक़्ल अधूरी है, तो किसी ऐसे इंसान की तलाश करो जिसकी अक़्ल मुकम्मल हो। उसकी संगत से तुम्हारी अधूरी अक़्ल भी मुकम्मल हो जाएगी।

जिस तरह बहार की ताज़ा हवा बेलों और अंगूर के लिए आब-ए-हयात (जिंदगी की रूह) है, उसी तरह नेक इंसानों की पाक सास इंसान की रूह को ज़िंदा करती है।

औलिया की नसीहत

औलिया-ए-अल्लाह की बातों से कभी मुंह न मोड़ो। चाहे वे नरमी से कहें या सख्ती से, उनकी हर बात इंसान को जहन्नम से बचाने का ज़रिया है। उनकी नसीहतें रहमत का सबब बनती हैं।

सच्चाई और यक़ीन की अहमियत

लेख में यह भी बताया गया है कि सच्चाई (सिद्क़) और यक़ीन (विश्वास) इंसान की ज़िंदगी का असली ख़ज़ाना हैं। अगर दिल के बाग़ का एक तिनका भी कम हो जाए, तो अक़्लमंद इंसान पर हज़ारों ग़म छा जाते हैं।

यानी इंसान को अपने दिल को हमेशा साफ़ रखना चाहिए, ताकि अक़्ल और रूह दोनों तरोताज़ा रहें

सीख

इस वाक़िए से हमें यह सीख मिलती है कि इंसान को सिर्फ़ बाहरी मतलब पर नहीं रुकना चाहिए, बल्कि असल हक़ीक़त को समझने की कोशिश करनी चाहिए। औलिया की नसीहतों को अपनाना, बहार की तरह ताज़गी और नफ़्स की बुराइयों से बचने का रास्ता है।

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