नफ़्स-ए-मुतमइन्ना और जन्नत की राह:
हमें दुआ और इबादत की गहराई सिखाते हैं। हज़रत नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें दुआ का सही तरीका बताया:
ऐ अल्लाह! हमारी मुश्किलें आसान कर दे, हमें दुनिया और आख़िरत दोनों में भलाई अता कर, और हमें सीधा रास्ता (सिरात-ए-मुस्तकीम) पर मजबूती से चला।
यह दुआ सिर्फ अल्फ़ाज़ नहीं बल्कि एक मुमिन की पूरी ज़िंदगी की रहनुमाई है। जब इंसान अपने नफ़्स पर काबू पा लेता है, तो उसकी निगाह में जहन्नुम भी जन्नत जैसी लगती है। इसका मतलब यह है कि जिसने अपनी इच्छाओं और बुरे खयालात को काबू कर लिया, उसके लिए हर मुश्किल आसान और हर तकलीफ़ रहमत बन जाती है।
नफ़्स और सुकून का रिश्ता:
मुमिन इंसान नफ़्स-ए-अम्मारा यानी बुरी ख्वाहिशों वाली आग को छोड़कर नफ़्स-ए-मुतमइन्ना यानी सुकून देने वाले दिल का पानी हासिल कर लेता है। यही असल जन्नत है। ऐसे आशिक़, अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इश्क़ में जलने वाले परवाने की तरह होते हैं, जो हर हाल में अपने रब की राह में डटे रहते हैं।
साहिबान-ए-रूह की पनाह:
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह भी हिदायत दी कि ऐसे रूहानी लोगों की पनाह में जाओ, जो अल्लाह के करीब हैं। उनकी संगत में रहकर इंसान खुद को बुराई से बचा लेता है और नेक राह पर चल पड़ता है।
इबादत की अहमियत:
हमें इबादत को टालना नहीं चाहिए बल्कि वक्त पर अदा करनी चाहिए। इससे दिल ज़िंदा होता है और नींद से उठाकर भी अल्लाह की याद दिलाई जाती है।
अल्लाह का करम:
जब अल्लाह अपने बंदे पर रहमत और मोहब्बत का हाथ रख देता है, तो उसके गुनाह भी रहमत में बदल जाते हैं। अल्लाह कभी भी अपने करम के दरवाज़े बंद नहीं करता। कभी-कभी तकलीफ़ देना भी इंसान के लिए भलाई का सबब होता है, क्योंकि वही उसे अल्लाह के और करीब कर देता है।
इस वाक़िए से हमें क्या सीख मिलती है?
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दुआ हमेशा अल्लाह की रहमत और रहनुमाई मांगने के लिए करनी चाहिए।
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नफ़्स पर काबू पाना ही असल जन्नत का रास्ता है।
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अल्लाह के वली और साहिब-ए-रूह की संगत इंसान को सीधा रास्ता दिखाती है।
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इबादत को कभी देर से न करें और न ही छोड़ें।
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तकलीफ़ भी कभी-कभी रहमत का रूप होती है।



