हक़ीक़ी इश्क़ – परछाइयों से हकीकत तक का सफर:
इस्लामी वाक़ियात इंसान की रूह को यह समझाते हैं कि दुनिया में कुछ भी बिना मक़सद के नहीं घूम रहा। हर चीज़ किसी न किसी हिकमत के तहत चल रही है। लेकिन सच्चे आशिक़ का हाल अलग है। जो शख्स हक़ीकी तौर पर अल्लाह की ज़ात का आशिक़ हो जाता है, उसकी जान और उसका वजूद सिर्फ़ उसी के लिए समर्पित हो जाता है।
हक़ीक़ी इश्क़ और मज़ाजी इश्क़ का फर्क
कहा गया है कि जब कोई चीज़ के हिस्से (जुज़) का आशिक़ होता है, तो वह अपने असल (कुल) की तरफ़ जल्दी चला जाता है। लेकिन जो सिर्फ़ परछाई या तस्वीर का आशिक़ बनता है, वह हक़ीक़त को पहचान नहीं पाता।
उदाहरण के तौर पर, अहमद ने जब दीवार पर चमकती हुई धूप देखी, तो उसने समझा कि यही रोशनी असल है और उसी का आशिक़ बन गया। लेकिन वह यह न समझ सका कि यह रोशनी तो असल सूरज का सिर्फ़ अक्स है। जब यह रोशनी अपनी असल सूरज से जा मिली, तो दीवार फिर से अंधेरी रह गई।
साये का धोखा
मजाज़ का आशिक़ उस शिकारी की तरह है जो परिंदे के साए को पकड़ने की कोशिश करता है। उसने परिंदे के साए को पकड़ लिया, लेकिन असल परिंदा पेड़ पर बैठा हंस रहा था। साया कभी हक़ीक़त नहीं हो सकता, जैसे मजाज़ी मोहब्बत असली इश्क़ नहीं होती।
रसूलों का मक़सद
इंसान और अल्लाह की ज़ात के बीच अगर कोई फ़र्क़ न होता, तो रसूलों को भेजने की कोई ज़रूरत नहीं थी। रसूल इसलिए भेजे गए कि इंसान को उसकी असल हक़ीक़त से मिलाएं और मजाज़ के धोखे से निकालकर हक़ीक़ी इश्क़ की तरफ़ ले जाएं।
हमें क्या सीख मिलती है?
इस वाक़िए से हमें यह सीख मिलती है कि इंसान को मजाज़ और परछाई के पीछे भागने के बजाय असल हक़ीक़त यानी अल्लाह की ज़ात का आशिक़ होना चाहिए। असली इश्क़ वही है जो इंसान को उसकी हक़ीक़ी मंज़िल तक पहुँचा दे। दुनिया की दिखावट और साये धोखा हैं, लेकिन हक़ीक़त वही है जो अल्लाह और उसके रसूल से जुड़कर हासिल होती है।



