क़ियास और अहंकार – इंसान को अल्लाह की रहमत से कैसे दूर करता है
पहला क़ियास करने वाला — अबलीस
सबसे पहला प्राणी जिसने अल्लाह के नूर और तजल्लियात (रूहानी चमक) के सामने क़ियास किया, वह था अबलीस (शैतान)।
जब अल्लाह ने हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) को पैदा किया और फ़रिश्तों को सज्दा का हुक्म दिया, तो सबने झुक गए, मगर अबलीस ने कहा:
मैं आग से बना हूँ और आदम मिट्टी से। आग मिट्टी से बेहतर है।
अल्लाह ने जवाब दिया:
तू समझता है कि बड़ाई नस्ल और मादे से होती है? नहीं! असली बड़ाई तक़्वा (परहेज़गारी) से होती है।
यानी, जो अल्लाह से डरता है, वही ऊँचा है।
वंश, ज्ञान या बुद्धि से नहीं, बल्कि विनम्रता और ख़ुलूस से इंसान को ऊँचा दर्जा मिलता है।
तक़्वा – असली विरासत
अल्लाह ने फरमाया कि यह दुनिया की विरासत नहीं बल्कि अंबिया (पैग़म्बरों) की विरासत है।
वह विरासत है — तक़्वा और परहेज़गारी।
क्योंकि अबू जहल का बेटा मुसलमान हो गया, और नबी नूह (अलैहिस्सलाम) का बेटा गुमराह रहा।
इससे साबित हुआ कि वंश नहीं, बल्कि ईमान और अमल ही इंसान की पहचान हैं।
क़ियास और अंदाज़े की हद
क़ियास यानी अंदाज़ा या तर्क — कभी-कभी सही दिशा देता है,
जैसे बादलों वाले दिन में कोई दिशा तय करने के लिए इस्तेमाल होता है।
मगर जब सूरज और काबा सामने हों, तब क़ियास का सहारा लेना मूर्खता है।
यानी जब हक़ (सच्चाई) सामने है, तब तर्क की ज़रूरत नहीं।
जो लोग अपने विचारों को “ख़ुदा का पैमाना” बना लेते हैं वो गुमराही में गिरते हैं।
अक़्ल का ग़लत इस्तेमाल
अबलीस ने भी अपनी अक़्ल का ग़लत इस्तेमाल किया।
उसने नूर के सामने क़ियास (तुलना) की और खुद को ऊँचा समझा।
इसी अहंकार ने उसे गिरा दिया।
कई इंसान भी उसी राह पर चलते हैं —
इल्म (ज्ञान) पाकर घमंडी हो जाते हैं, और दूसरों को नीचा दिखाते हैं।
हारूत और मारूत का किस्सा
अल्लाह के दो नेक फ़रिश्ते — हारूत और मारूत — हमेशा अल्लाह से डरते थे।
लेकिन जब उनमें यह ख्याल आया कि “हमसे बुराई कैसे हो सकती है? हम तो रूहानी मख़लूक़ हैं
तो यही सोच ख़ुदबीन बन गई।
उन्होंने कहा:
हम माटी और पानी से नहीं बने। हम तो आसमानी हैं, ज़मीन पर इबादत करेंगे और फिर लौट जाएँगे।
उनकी इस सोच में अहंकार का बीज बोया गया।
उन्होंने आसमान के हालात को ज़मीन पर क़ियास किया, जबकि दोनों में बड़ा फर्क है।
यही उनकी आज़माइश की जड़ बनी।
आसमानी और ज़मीनी फर्क
आसमान में सिर्फ़ इबादत और नूर है, लेकिन ज़मीन पर ख़्वाहिशें, अहंकार और नफ़्स हैं।
जब कोई आसमानी सख्स ज़मीनी सोच में उतरता है, तो उसे अपने नफ़्स से लड़ना पड़ता है।
हारूत और मारूत का गिरना हमें यही सिखाता है कि —
अहंकार, चाहे फ़रिश्तों में हो, उसे भी गिरा देता है।
इंसान के लिए सबक़
इंसान को अपनी अक़्ल का इस्तेमाल करना चाहिए, लेकिन अहंकार के साथ नहीं।
अल्लाह की नज़रों में इज़्ज़त उन्हें मिलती है जो मुट्ठी भर मिट्टी जैसे विनम्र हैं।
इबादत, तक़्वा और विनम्रता — यही रूह की रोशनी हैं।
क़ियास की हद और तक़्वा की ताक़त
क़ियास तब तक उपयोगी है जब तक वह हक़ की तलाश में हो।
लेकिन जब इंसान अपने तर्क को अल्लाह की हिकमत से ऊपर रख देता है —
वह अबलीस की राह पर चल पड़ता है।
अल्लाह के सामने सिर झुकाना ही असली इल्म है,
और यही तक़्वा इंसान को वली (अल्लाह का दोस्त) बना देता है।
तक़्वा की विरासत – नबियों का असली तोहफ़ा
तक़्वा वह रोशनी है जो दिल को नूर से भर देती है।
यह किसी वंश या दौलत से नहीं मिलती, बल्कि सच्चे इमान और अमल से आती है।
यही वजह है कि अल्लाह अपने नेक बंदों को ऊँचा उठाता है,
चाहे उनका माद्दा, समाज या दर्जा कुछ भी क्यों न हो।
हमें क्या सीख मिलती है
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अहंकार और तर्क (क़ियास) इंसान को अल्लाह की रहमत से गिरा देते हैं।
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असली बड़ाई वंश, रूप या ज्ञान में नहीं, बल्कि तक़्वा और परहेज़गारी में है।
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फरिश्ते भी अगर खुदबीन बनें तो गिर जाते हैं, इंसान को और ज़्यादा विनम्र होना चाहिए।
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जो अपनी अक़्ल को अल्लाह के नूर के आगे झुका देता है, वही सच्चा मोमिन है।
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रूह की बुलंदी तक़्वा, इबादत और अदब से मिलती है — अहंकार से नहीं।


