अल्लाह से इश्क़ ही असली दीन और मज़हब है:
इस वाकिए में यह बयान आता है कि एक सच्चा आशिक अल्लाह से उसी तरह बातचीत करता है जैसे कोई अपने महबूब से करता है। उसकी बातें बनावटी नहीं होतीं, बल्कि दिल से निकलती हैं। लेकिन अगर दिल में अल्लाह का इश्क़ और शौक़ न हो, तो सिर्फ ज़बान से बातें करना दिल को मुर्दा बना देता है।
इंसान की असली पहचान
मर्द-ए-हक़ (सच्चे अल्लाह वाले) का काम यह है कि वह लोगों को अल्लाह से जोड़ें, न कि उन्हें उससे दूर करें। हर इंसान को अल्लाह अपनी तोफ़ीक़ और क्षमता के मुताबिक समझ और ताक़त देता है।
अल्लाह इंसान के बाहरी हालात को नहीं देखता, बल्कि उसकी अंदरूनी मोहब्बत और आज़ारी (विनम्रता) पर नज़र करता है। असली क़ीमत दिल की सच्चाई और मोहब्बत में है।
इश्क़ का असली मज़हब
यह वाक़िया हमें बताता है कि इश्क़ की आग को जलाना ज़रूरी है। क्योंकि असली दीन और मज़हब सिर्फ अल्लाह का इश्क़ ही है। जो इंसान अल्लाह से सच्ची मोहब्बत करता है, वही उसका असली बंदा कहलाता है।
हमें क्या सीख मिलती है?
इस इस्लामी वाक़िया से हमें यह सीख मिलती है कि अल्लाह के साथ सच्चा इश्क़ ही असली दीन है। अल्लाह हमारे बाहरी हालात नहीं देखता, बल्कि हमारे दिल की सच्ची मोहब्बत और विनम्रता को देखता है। अगर हम अल्लाह से दिल से जुड़ें तो यही हमें असली कामयाबी तक पहुँचाता है।



