फिज़ूलखर्ची और बख़ीलपन से सबक:
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नसीहत
हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि हमेशा दो फरिश्ते नसीहत करते हैं:
ए अल्लाह! बख़ील (कंजूस) को दुनिया में बर्बादी और तबाही के अलावा कुछ न मिले।
और खर्च करने वालों को अच्छा सिला अता फ़रमा।
यह हदीस इंसान को यह समझाती है कि अल्लाह की राह में खर्च करना बड़ा सवाब है, जबकि बख़ीलपन इंसान को तबाही की तरफ ले जाता है।
खर्च करने का सही तरीका
इस्लाम में खर्च करने का मतलब केवल पैसा देना नहीं, बल्कि मौके और ज़रूरत को समझकर देना है। बहुत बार ऐसा होता है कि किसी जगह पर खर्च न करना, खर्च करने से बेहतर होता है। यह समझदारी और हिकमत का हिस्सा है।
अल्लाह का माल उसी के हुक्म से खर्च किया जाना चाहिए। अगर इंसान बिन हुक्म के खर्च करे, तो यह ग़लत है। सही रास्ते पर खर्च करने वालों के लिए अल्लाह तआला के ख़ज़ाने बेइंतिहा हैं।
ग़लत राह पर खर्च करना
कुरआन मजीद में उन लोगों की निंदा की गई है जो बुराई के रास्ते पर खर्च करते हैं। उनकी फिज़ूलखर्ची आख़िरत में हसरत (पछतावे) का कारण बनेगी।
बदर की लड़ाई का वाक़िया इसका बड़ा सबक है। कुफ़्फ़ार ने अपने ऊँटों को ज़बह किया, ताक़त दिखाई, लेकिन अल्लाह के हुक्म से मुसलमानों को फ़तह नसीब हुई।
सीख
इस वाक़िए से हमें यह सबक मिलता है कि:
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बख़ील इंसान कभी कामयाब नहीं हो सकता।
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सही जगह और सही वक़्त पर खर्च करना सबसे बड़ी नेकी है।
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अल्लाह के माल को उसी के हुक्म से खर्च करना चाहिए।
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ग़लत राह पर खर्च करना आख़िरत में हसरत का कारण होगा।



