फरमान ए रसूल अल्लाह सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम

रहमत और बहार का राज़

इस्लामिक वाक़ियात में कई गहरी बातें छुपी हुई हैं, जो इंसान के दिल और दिमाग को बदलने की ताक़त रखती हैं। एक ऐसी ही बात हमें हज़रत नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फ़रमान से मिलती है।

नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि बहार की ठंडक यानी एक सच्चे और कामिल मुरशिद की सोहबत से अपने आपको दूर मत करो। क्योंकि यह सोहबत तुम्हारी रूह के साथ वैसा ही असर करती है, जैसा बहार का मौसम पेड़ों पर करता है। जिस तरह सूखे पेड़ बहार में फिर से ज़िंदा हो जाते हैं, उसी तरह इंसान का दिल और रूह भी एक सच्चे मरشد की सोहबत से नई ज़िंदगी पाते हैं।

मुरशिद की सोहबत का असली फ़ायदा

सच्चे मुरशिद की सोहबत, रूहानी बहार लाती है। जब इंसान ऐसे वक़्त का फायदा उठाता है, तो उसकी रूह ताज़ा हो जाती है। यह नेमत उन लोगों के लिए है जो वक़्त की कद्र करते हैं और अपने दिल को हक़ की तरफ मोड़ लेते हैं।

अगर इंसान दुनियावी कामों और हवस की आंधियों में खोया रहे तो उसका दिल सूखे पेड़ जैसा हो जाता है। लेकिन जो शख्स बहार मुरशिद की रहनुमाई का फायदा उठाता है, वो रूहानी गुलशन की तरफ बढ़ जाता है और अपने असली मक़सद तक पहुँच जाता है।

बुरे खयालात से बचाव

इंसान का नफ़्स और बुरी ख्वाहिशें उसके लिए पतझड़ की तरह होती हैं। ये ख्वाहिशें इंसान की रूह को सूखा देती हैं। जैसे पतझड़ पेड़ों को पत्तों से खाली कर देता है, वैसे ही नफ़्स इंसान की रूह को ख़ाली कर देता है।

इसलिए नबी करीम ﷺ का फ़रमान हमें यह सीख देता है कि बहार यानी मुरशिद की सोहबत से जुड़कर, हम नफ़्स और बुरे खयालात की पतझड़ से बच सकते हैं।

हमें क्या सीख मिलती है?

इस वाक़िए से हमें यह सिखने को मिलता है कि जिस तरह बहार का मौसम पेड़ों को नई ज़िंदगी देता है, उसी तरह एक सच्चे और कामिल मुरशिद की सोहबत इंसान के दिल और रूह को ज़िंदा कर देती है। हमें अपने दिल से बदगुमानी और शक्क को दूर करके, मुरशिद की रहनुमाई को अपनाना चाहिए। असली ज़िंदगी वही है जिसमें इंसान अपने नफ़्स और हवस से बचकर रूहानी बहार को हासिल करे।

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