बाहरी दुश्मन नहीं, असली दुश्मन है नफ़्स
हज़रतों से एक नसीहत बयान की गई है:
ए बुज़ुर्गो! हमने बाहर के दुश्मन को तो मार डाला, लेकिन उससे भी बड़ा और ज़लील दुश्मन हमारे अंदर (नफ़्स) में बचा रह गया। इस दुश्मन को हराने के लिए सिर्फ़ अक़्ल या होश की ज़रूरत नहीं, बल्कि आत्मा की मज़बूती चाहिए। नफ़्स शेर की तरह है, जिसे एक छोटा-सा ख़रगोश भी क़ाबू नहीं कर सकता।
नफ़्स की आग और जहन्नम
लेख में बताया गया है कि नफ़्स दरअसल जहन्नम (नर्क) की तरह है। यह आग एक अजदहा (भयंकर नाग) की तरह है, जिसे सात समुद्र भी भर नहीं सकते। इसकी भूख कभी ख़त्म नहीं होती।
क़यामत के दिन अल्लाह तआला जहन्नम से पूछेगा: क्या तेरा पेट भर गया? जहन्नम कहेगी: और लाओ। तब अल्लाह अपनी शक्ति से उसे कुन (हो जा) कहेगा और वह शांत हो जाएगी।
सीधा तीर और टेढ़े रास्ते
नफ़्स की गुमराही इंसान को टेढ़ा बना देती है। जैसे तीर अगर टेढ़ा हो तो कभी निशाने तक नहीं पहुंच सकता। अल्लाह की क़ुदरत की क़मान (धनुष) में सिर्फ़ सीधा तीर ही काम आता है। इसलिए इंसान को चाहिए कि खुद को सीधा बनाए ताकि अल्लाह के रास्ते पर चल सके।
असली शेर कौन?
दूसरों को हराना और चीड़-फाड़ करना आसान है, लेकिन असली बहादुर (शेर) वह है जो अपने नफ़्स पर ग़ालिब आ जाए। यही जिहाद-ए-अकबर है। जो इंसान खुद को मात दे देता है, वही अल्लाह की मदद से अल्लाह का शेर बनता है।
सीख
इस वाक़िए से हमें यह सीख मिलती है कि असली जंग बाहरी दुश्मनों से नहीं बल्कि अपने अंदर के नफ़्स से है। नफ़्स की भूख कभी ख़त्म नहीं होती, उसे जीतने के लिए अल्लाह की मदद और खुद पर क़ाबू पाना ज़रूरी है। जो इंसान अपने नफ़्स को मात दे देता है, वही असली विजेता कहलाता है।



