रूह की तासीर और अल्लाह से वस्ल की हकीकत

इंसान की रूह, इश्क़ और अल्लाह से मिलने का सफ़र

इंसान की सारी क्षमताएँ उसके जिस्म की वजह से हैं। जैसे धरती सूरज की रोशनी से दिन और रात पाती है, वैसे ही रूह जिस्म के दायरे में रहते हुए उजाला और अंधेरा महसूस करती है।
अगर इंसान मेहनत (मुझाहिदा) से अपने जिस्मानी परदे हटा दे, तो उसकी रूह हमेशा के लिए नूर से भर जाती है — और उस पर ग़फलत के निशान नहीं रह जाते।

रूह की पाकी और इंसानी हालत

सारी बुराइयाँ इंसान के जिस्म से निकलती हैं, रूह उनसे पाक होती है। जिस तरह चेहरा कभी लाल, कभी पीला, कभी सफेद दिखता है — वैसे ही इंसान के हालात बदलते रहते हैं।
मगर रूह तो हमेशा रोशन और खुश रहती है, क्योंकि वह अल्लाह की अमानत है।

मुझाहिदा और असली मक़सद

जब इंसान अपने रूहानी सफ़र में मुझाहिदा करता है, तो वह अस्बाब (संसार के कारणों) से निकलकर अस्बाब के पैदा करने वाले — मुसब्बिबुल-अस्बाब (अल्लाह) — को पहचानने लगता है।
जब तक वह इस हकीकत को नहीं समझता, तब तक वह दुनिया के साधनों को ही असली मानता रहता है।

रूह का लामकान सफ़र

जब इंसान की रूह पाक और मुकम्मल हो जाती है, तो वह लामकान (समय और स्थान से परे) हो जाती है। ऐसी रूह की तुलना में हमारी अकल बहुत कमज़ोर है।
रूह का इल्हाम (प्रेरणा) अल्लाह की ओर से सीधी वाही जैसा होता है, जबकि अकल की सोच सिर्फ़ क़यास (अंदाज़ा) होती है।

रूह और अकल का फर्क

रूह और अकल में वही फर्क है जो सूरज और उसकी रोशनी में है।
रोशनी सूरज से निकलती है, लेकिन सूरज उससे कहीं ज़्यादा तगड़ा और स्थायी होता है।
इसलिए सालिक (सच्चा साधक) को सिर्फ़ रोशनी पर नहीं रुकना चाहिए — बल्कि उसे सूरज तक, यानी अल्लाह की ज़ात तक पहुँचने की कोशिश करनी चाहिए।

रूहानी नूर और फना का रहस्य

जो व्यक्ति अल्लाह की ज़ात तक पहुँच जाता है, वह हमेशा के लिए दायमी नूर (अनंत रोशनी) में डूब जाता है।
उसके लिए अब कोई दुनियावी ग़म या जुदाई मायने नहीं रखती। वह अब फना नाश से आगे बढ़कर बक़ा स्थायित्व की मंज़िल पा लेता है।

लाहूती और नासूती का रहस्य

लाहूती (दैवी) रूह इतनी ताक़तवर होती है कि नासूती (मानवी) शरीर उसकी पूरी रौशनी को नहीं झेल सकता।
अगर सूरज हमेशा धरती पर चमके तो धरती जल जाएगी — उसी तरह अगर रूह पूरी तरह नूर में डूब जाए तो जिस्म उसे संभाल नहीं सकता।
पानी की मछली जैसे सदा पानी में रहती है, लेकिन साँप समुद्र में नहीं रह सकता। इसी तरह रूह को नूर की दुनिया से ताल्लुक़ है, जबकि जिस्म को मिट्टी से।

अल्लाह के वली और उनकी करामात

सूफी संत यानी औलिया अल्लाह ऐसे लोग हैं जिनकी रूहें नूर में रची-बसी होती हैं।
उनकी मौजूदगी से बुरे लोग नेक बन जाते हैं। उनका असर जादू की तरह होता है — मगर वह हलाल जादू है, यानी अल्लाह की इजाज़त से।
उनकी महफ़िल में बैठने से दिल पाक हो जाता है, और ग़ाफ़िल (बेपरवाह) इंसान भी रूहानी ताजगी महसूस करता है।

मुरशिद और मुरिद का रिश्ता

औलिया अल्लाह अपने मुरिदों (शागिर्दों) को नसीहत करते हैं कि केवल ज़िक्र-फ़िक्र काफी नहीं है।
शेख (गुरु) की खिदमत और अदब ज़रूरी है। जब मुरिद सच्चे दिल से इताअत करता है, तभी उसे आध्यात्मिक नज़बत  मिलती है।

इल्म और इश्क़ का संतुलन

कई लोग सोचते हैं कि रूहानी बातें बेकार हैं, लेकिन सच्चे सूफी जानते हैं कि हर इल्म का मक़सद दिल को ज़िंदा करना है।
जिस तरह सूरज की किरणें बार-बार धरती को नई ज़िंदगी देती हैं, वैसे ही रूहानी इल्म इंसान के दिल को ताजगी देता है।

औलिया का सच्चा मिशन

औलिया अल्लाह लोगों के दिलों तक अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाते हैं।
वो अपने शागिर्दों की आत्मिक तरक्की के लिए हर हाल में मेहनत करते हैं — चाहे सामने बैठे लोग ध्यान दें या नहीं।
उनका मक़सद सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा संतोष है, न कि शोहरत या तारीफ़।

हमें क्या सीख मिलती है

  • इंसान की असली पहचान उसका जिस्म नहीं, बल्कि उसकी रूह है।

  • रूह अगर अल्लाह के नूर में डूब जाए, तो वह हमेशा के लिए ज़िंदा रहती है।

  • औलिया अल्लाह जैसे वली हमारे रूहानी रहनुमा हैं, जो हमें नूर तक पहुँचाने का रास्ता दिखाते हैं।

  • इल्म (ज्ञान) और इश्क़ (प्रेम) का संगम ही इंसान को मुकम्मल बनाता है।

  • अल्लाह की राह में सच्चे अदब, खिदमत और मुरशिद की इताअत से ही रूहानी मंज़िल हासिल होती है।

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